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करुण रस क्या होता है | करुण रस के भेद | संपूर्ण परिचय | karun ras hindi grammar notes

करुण रस क्या होता है | संपूर्ण परिचय | karun ras hindi

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करुण रस  ( रस के भेद )

 

जहां किसी हानि के कारण शोक भाव उपस्थित होता है , वहां ‘ करुण रस ‘ उपस्थित होता है। पर हानि किसी अनिष्ट किसी के निधन अथवा प्रेमपात्र के चिर वियोग के कारण संभव होता है।

 

शास्त्र के अनुसार ‘शोक’ नामक स्थाई भाव अपने अनुकूल विभाव , अनुभाव एवं संचारी भावों के सहयोग से अभिव्यक्त होकर जब आस्वाद का रूप धारण कर लेता है तब उसे करुण रस कहा जाता है। प्रिय जन का वियोग , बंधु , विवश , पराधव , खोया ऐश्वर्य , दरिद्रता , दुख पूर्ण परिस्थितियां ,आदि आलंबन है।

 

प्रिय व्यक्ति की वस्तुएं , सुर्खियां , यश एवं गुण कथन संकटपूर्ण परिस्थितियां आदि उद्दीपन विभाव है। करुण रस के अनुभाव – रोना , जमीन पर गिरना , प्रलाप करना , छाती पीटना , आंसू बहाना , छटपटाना आदि अनुभाव है। इसके अंतर्गत निर्वेद , मोह , जड़ता , ग्लानि , चिंता , स्मृति , विषाद , मरण , घृणा आदि संचारी भाव आते हैं। भवभूति का मानना है कि –

” करुण रस ही एकमात्र रस है जिससे सहृदय पाठक सर्वाधिक संबंध स्थापित कर पाता है। “

यथा ‘रामचरित्रमानस’ में दशरथ के निधन वर्णन द्वारा करुण रस की चरम स्थिति का वर्णन किया गया है।

 

” राम राम कहि राम कहि राम राम कहि राम।
तनु परिहरि रघुबर बिरह राउ गयऊ सुरधाय। । “

 

आधुनिक कवियों ने करुण रस के अंतर्गत भी दरिद्रता एवं सामाजिक दुख – सुख का वर्णन सर्वाधिक किया है। इसी रूप में करुण रस की अभिव्यक्ति सर्वाधिक रूप में देखी जा सकती है। सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ कृत ‘ उत्साह ‘ शीर्षक कविता में व्याकुल जन-मानस का वर्णन करते हुए बादलों को करुणा प्रवाहित करते हुए बरसने का वर्णन किया गया है –

 

” विकल विकल , उन्मन थे उन्मन
विश्व के निदाघ के सकल जन,
आए अज्ञात दिशा से अनंत के घन।
तप्त धरा , जल से फिर
शीतल कर दो –
बादल गरजो। “

 

 

करुण रस के भेद

साधन, आलम्बन धर्मअपचय, मनवचन, क्रिया तथा प्रभाव की मात्रा को आधार मानकर करुण रस के अनेक भेद काव्यशास्त्र में मिलते हैं। साधन के आधार पर ‘द्रष्टजन्य’, ‘स्मृत अनिष्टजन्य’ तथा ‘श्रुत अनिष्टजन्य’ आदि भेद मिलते हैं, जो मूलत: करुण रस के उत्पादक कारणों के ही, ‘इष्टनाश’ और ‘अनिष्टप्राप्ति’ समानान्तर हैं। स्मृत और श्रुत केवल अनिष्टबोध के प्रकार को व्यक्त करते हैं, जिनके और भी प्रकार हो सकते हैं। ‘रसतरंगिणी’ में भानुदत्त ने करुण के आलम्बन को दृष्टि में रखकर ‘स्वनिष्ठ’ और ‘परनिष्ठ’ नामक दो भेद किये हैं। जब, शाप, बन्धन, क्लेश, अनिष्ट आदि अपने अर्थात् आश्रय से ही सम्बद्ध हों, दूसरे शब्दों में जब आश्रय ही स्वयं करुण रस का आलम्बन हो तो, उसे स्वनिष्ठ करुण कहा जायेगा, पर जब उक्त वस्तुओं का सम्बन्ध अपने से पृथक् आलम्बन से हो तो वह परनिष्ठ करुण होगा।

  • आनन्दप्रकाश दीक्षित ने इनके स्थान पर ‘करुणाजनक’ और ‘करुणाजनित’ शब्दों का प्रयोग वांछित माना है।
  • भरतमुनि के ‘नाट्यशास्त्र’ में करुण के तीन भेद मिलते हैं
  1. धर्मोपघातज,
  2. अपचयोद्भव,
  3. शोककृत।

इनमें अन्तिम शोककृत सबसे अधिक प्रभावशाली होता है। भावप्रकाशकार ने मन, वचन और क्रिया से अभिव्यक्ति लक्षित करके करुण को मानस, वाचिका और कर्म तीन प्रकार का माना है। इन्हें अनुभावभेद कहा जा सकता है।

  • मात्रा के अनुसार किये गए करुण के पाँच भेद उक्त भेदों की अपेक्षा hindi में अधिक प्रसिद्ध हैं
  1. करुण,
  2. अतिकरुण,
  3. महाकरुण,
  4. लघुकरुण,
  5. सुखकरुण।
  • रीतिकालीन ने अपने ‘शब्दरसायन’ के अन्तर्गत इन भेदों का उल्लेख किया है

करुना अतिकरुना अरु महाकरुन लघु हेत। 
एक कहत हैं पाँच में, दु:ख में सुखहिं समेत’

  • गुलाबराय ने अपने ‘नवरस’ नामक ग्रन्थ में इन पर विचार करते हुए लिखा है कि ‘प्रथम तीन भेदों में तो करुणा की मात्रा उत्तरोत्तर उच्च होती जाती है, पर लघुकरुण में कुछ कम हो जाती है। यहाँ वह केवल चिन्ता के रूप में रहती है। अनिष्ट का नाम रहता है, पर आशा नहीं टूटती। चित्त दुबिधा में रहता है। अनिष्ट निवारण का पूरी तरह प्रयत्न होता रहता है। सुखकरुण वह करुण है, जो हर्ष में बदलने वाला हो, किन्तु वहाँ पिछले वियोगजन्य करुण का प्रबल आवेग हर्ष को प्रभावित कर मनुष्य को रुला देता है। हर्ष के आँसू इसी प्रकार के होते हैं’।
  • संस्कृत काव्यशास्त्र के प्रमुख ग्रन्थों में इनका उल्लेख नहीं मिलता, कदाचित् इसीलिए आनन्दप्रकाश दीक्षित ने इस भेदों को निस्सार बताया है। वे किसी न किसी दूसरे रस में इनके अन्तर्भाव के पक्ष में हैं। रसास्वाद में स्तरभेद इन्हें अभीष्ट नहीं, यद्यपि आनन्दवर्धन आदि आचार्यों तक ने रसों में प्रकर्षभेद माना है। ये भेद निश्चय ही करुण रस की अनुभूति के विभिन्न स्तरों को व्यक्त करते हैं और उन्हें सर्वथा निराधार या असिद्ध नहीं कहा जा सकता।

 

 

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